
ए ज़ालिम ज़माने तुझको गुरुर किस बात का हे ..
विशाल १२.०९.2010

विशाल १२.०९.2010





ma मुझे आज तेरी बहुत याद आई 
लक्ष्यहीन !
में व्यथित हूँ ....
हालात से....
घूम रहा हूँ अपनी धुरी पर .....
सुर्यविहीन अन्तरिक्ष में ....
में व्यथित हूँ
नींद में बडबडाता सा ....
असामान्य सा स्वप्न देखता....
अघटित हो होते हुए देखता....
मेरे समय के पहिये की हवा निकाल दी जेसे किसी ने ....
लहराता इधर उधर ,गिरता संभलता ....
में व्यथित हूँ....
हस्त विहीन काया को लेकर ....
बहते अश्रुओं को केसे रोकूँ ?
आत्मा पर लगा कलंक केसे साफ़ करूँ ?
में व्यथित हूँ...
मन की सीमाएं बंधन में हे....
सोच पर कसकर रस्सी बाँध दी गई हे ....
कैसे कल्पना करूँ ?
नव संसार की .....!
विशाल ८.०४.2010




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