Tuesday, March 30, 2010

" ये दुनिया ..."






अजनबी ,गुमनाम सी ये दुनिया ....
कभी जानी पहचानी सी नज़र आती ये दुनिया ....

कभी अँधेरे में....
तो कभी उजालों में नज़र आती ये दुनिया ....


सुलझी हुई थी पहले ...

अब कशमकश में नज़र आती ये दुनिया....

मुश्किल में होता हूँ ,जब कभी.....
रंग तब दिखलाती हे ये दुनिया....

खुबसूरत सी लगने वाली हर तरफ से ....
भीतर से बेनूर नज़र आती हे ये दुनिया...

कभी नज़दीक लाये कभी तो .....
कभी खुद दूरियाँ बढ़ा देती हे ये दुनिया....
ख़ुशी में साथ रहती हे जो कभी ......
गम में ठुकरा देती हे ये दुनिया.....

हर तरफ से अंधेरों से भरी....
तुम्हारे प्यार से रोशन नज़र आती हे ये दुनिया ....
विशाल ३१.०३.10


परिणीता







तुम जो हो मेरी परिणीता ......

सुन्दर ,सुशील, सुकोमल पावन .....

माथे पर कुमकुम सजाये ........

लाज का घूँघट ओढ़े .......



तुम जो हो मेरी परिणीता ......

अपने दामन में बांधे ......

अनगिनत रिश्ते .......



सिर्फ तुम ही हो

अपनी खुशबु से महकाए .....

मेरा जीवन, मेरा मन .....





तुम जो हो मेरी परिणीता ......

अपनी आँखों में सजाये काज़ल ....

पलके जब उठाये तो ......

देखना चाहे सिर्फ मुझमे अपना संसार.....



तुम जो हो मेरी परिणीता ....

जो तलाशती हे बांहों में ,मेरी अपना अस्तित्व .....

अपनी पायल की झंकार से ......

गुंजाती मेरा घर , आँगन ......




तुम जो हो मेरी परिणीता .....

जिसके होने मात्र से ......

दिन रात hote हे मेरे .....

ऋतुएँ बदलती हे .....






तुम जो हो मेरी परिणीता .....

जो मुस्कुराये एक बार तो .....

फूट पड़ते हे बंद .....

कलियों में प्राण .....






तुम जो हो मेरी परिणीता .....

मेरी प्रेरणा ,ईश्वर का आशीर्वाद .....

जो छूले मुझे तो ........
पवित्र हो जाऊं माँ गंगा के सामान.............




तुम जो हो मेरी परिणीता ......

जो हे मेरे ह्रदय में .....

मेरे हर जन्म की संगिनी ......

जिस पर हे मुझे खुद से ज्यादा विश्वास .......
vishal 30.03.10
















Monday, March 29, 2010

कुछ ऐसा कर दो .....










मै घना अँधेरा हूँ ...



आज मेरे सीने पर ......



जुगनुओं के पर रख दो !






रंगों में नहला दो मुझे ....



इन सुलगती पलकों पर .....



तितलियों के पर रख दो .......!




चाहे कोई दिन हो या वक़्त ......



दिन गयी बहारों के ,



फिर से लौट आयेंगे ........






बस एक फूल की कली .....



अपने होठों से छूकर .......






मेरे होठों पर रख दो .......................!









विशाल २९.०३.१०

"अभिलाषा"............






यूँ लगता है ;


जैसे तुम सब कुछ हो ...............


और में एक क़तरा


समंदर ............. !





तुम हो असीमित ;


सितारों से भरा आकाश ......


मेरे विचारो से निकली


सुबह की पहली किरणों का


प्रकाश ..... ...... !





तुम हो ;


किसी परिंदे की पहली उड़ान ........


किसी नन्हे बच्चे को लिए हाथों में ,


माँ की कोमल छूअन ...........................!





तुम हो सावन की ठंडी ;


बयार .................


वीणा के तारों से अलापती ,


एक मधुर झंकार .........................!





तुम पूर्ण हो ;


और में एक अधूरा ख्वाब ........


जिसकी पूर्णता तभी हे


जब इसे देखो तुम ,


एक नज़र ..............................!



तुम हो एक सार्थक प्रयास ;

तुम हो अभिलाषा .........................


उन सभी अभिलाषाओं की ,


जिनको सभी करना चाहते हे ....


पूरी


सब दिन रात........................!





तुम लगन हो ,


मेरे जीवन की ;


आस मेरे जीवन की .........


तुम अंदाज़ हो मेरा


कुछ ख़ास ,



मेरे घर का


सौभाग्य ......


गृहलक्ष्मी , अन्नपूर्णा


सुख समृद्धि की देवी .............!





मेरे लिए माता पिता का


शुभाशीष .........


तुम हो मेरे जीवन की सम्पूर्णता ,


तुम हो विश्वास ,,,,,,


मेरा आभास ..........................!





तुम हो एक कहानी ;


जो कभी नही कही गयी............


दृश्य ,


जो कभी दिखाई नहीं दिया..........!



तुम एक सच्चाई हो


मेरी ....


जिसे कोई बदल नही सकता ,


तुम मेरी किस्मत में नहीं .......


खुद मेरी किस्मत हो ....................!




तुम हो एक आदर्श ,


सबके लिए ..........


तुम हो सर्वत्र ,


सभी जगह..................!



तुम कोई कृति नही ,


खुद रचयिता हो........


जीवन का उद्देश्य देती ;


जो सबको ..................!





तुम हो अंतहीन ,


तुम हो मेरे जीवन की .....


प्रथम और
अंतिम



अभिलाषा ..........................


अनंत तक ............................................. !











विशाल 29.03.2010

मेरी तुम


तुम्हारी ख्यालों से ,

मचल उठता हे मन !


जाने कितनी यादें हे दिल में

छलक रही हे हर धड़कन !


कल जाने क्या बात थी ,

प्यार के सपनो से छलकती रात थी !


आज की ये "सुहानी " सुबह

ले आई हे आँखों में ,

किसी सपने की रंगीन यादें !


तुम्हारा प्यार और तुम्हारा " स्पर्श"

अभी भी हे जैसे मेरे बदन पर !


कोई पहचाने से गीत की तरह ,

मीठी सी वो यादें

झनझना सी रही हें मेरे बदन में !


पर क्या था, वो सपना ?

क्यों याद नही आता ?


क्या था उसमे ऐसा

की

चाँद उसे चुराकर ले गया !


...............29.03.2010

जीवन


मै खड़ा स्तब्ध ,,

अचंभित;

विचार करता

की !

जीवन क्या है ?


कल -कल करती नदिया:

जैसे एक लय मे बहती ह़े ;

सतत निरंतर ,

आशान्वित करती

चर अचर को ;



मे सोचता हूँ ;

क्यों पंछी उड़ान भरते ह़े ?

यंहा से वंहा

नव जीवन की तलाश मे ......

नए कल के निर्माण मे ....

घौंसला बनाते ह़े !



फिर में सोचता हूँ ;

में क्या हूँ ?

एक माटी का पुतला मात्र !

दायित्वों का निर्वाह करता ........

आगे बढ़ता ...........


विधाता को नमन करता ;

कोटि कोटि !


जिसने ये संसार बनाया ;

सबको कर्म करना सिखाया ......


यही जीवन ह़े '

अब में जान गया हूँ !




"विशाल " २९.०३.१०

Sunday, March 28, 2010

तुम्हारी स्मृतियाँ


सुकोमल मधुर

वे तुम्हारी स्मृतियाँ

जैसी तुम

एक ऊर्जा प्रवाह

प्रवाहित होता जो निरंतर

प्रकृति में

मेरे ह्रदय में,


कभी धुंधली ना हुई जो,

हर पल में शामिल हे जो मेरे

वे तुम्हारी स्मृतियाँ

कोटि सूर्यों की लालिमा सी

अनंत तारों की झिलमिलाहट सी

झिलमिलाती

वे तुम्हारी स्मृतियाँ

सुनाई देती हे पदचाप

अंतर्मन में तुम्हारे साथ की

वो हमारे प्रेम को साक्षात दर्शाती

तुम्हारी वे स्मृतियाँ

मेरे मन को महकाती

हर्षाती

सुकोमल , मधुर

तुम्हारी वे स्मृतियाँ



विशाल 2८.०३.२०१०