Monday, March 29, 2010

जीवन


मै खड़ा स्तब्ध ,,

अचंभित;

विचार करता

की !

जीवन क्या है ?


कल -कल करती नदिया:

जैसे एक लय मे बहती ह़े ;

सतत निरंतर ,

आशान्वित करती

चर अचर को ;



मे सोचता हूँ ;

क्यों पंछी उड़ान भरते ह़े ?

यंहा से वंहा

नव जीवन की तलाश मे ......

नए कल के निर्माण मे ....

घौंसला बनाते ह़े !



फिर में सोचता हूँ ;

में क्या हूँ ?

एक माटी का पुतला मात्र !

दायित्वों का निर्वाह करता ........

आगे बढ़ता ...........


विधाता को नमन करता ;

कोटि कोटि !


जिसने ये संसार बनाया ;

सबको कर्म करना सिखाया ......


यही जीवन ह़े '

अब में जान गया हूँ !




"विशाल " २९.०३.१०

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