
मै खड़ा स्तब्ध ,,
अचंभित;
विचार करता
की !
जीवन क्या है ?
कल -कल करती नदिया:
जैसे एक लय मे बहती ह़े ;
सतत निरंतर ,
आशान्वित करती
चर अचर को ;
मे सोचता हूँ ;
क्यों पंछी उड़ान भरते ह़े ?
यंहा से वंहा
नव जीवन की तलाश मे ......
नए कल के निर्माण मे ....
घौंसला बनाते ह़े !
फिर में सोचता हूँ ;
में क्या हूँ ?
एक माटी का पुतला मात्र !
दायित्वों का निर्वाह करता ........
आगे बढ़ता ...........
विधाता को नमन करता ;
कोटि कोटि !
जिसने ये संसार बनाया ;
सबको कर्म करना सिखाया ......
यही जीवन ह़े '
अब में जान गया हूँ !
"विशाल " २९.०३.१०
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