Monday, March 29, 2010

"अभिलाषा"............






यूँ लगता है ;


जैसे तुम सब कुछ हो ...............


और में एक क़तरा


समंदर ............. !





तुम हो असीमित ;


सितारों से भरा आकाश ......


मेरे विचारो से निकली


सुबह की पहली किरणों का


प्रकाश ..... ...... !





तुम हो ;


किसी परिंदे की पहली उड़ान ........


किसी नन्हे बच्चे को लिए हाथों में ,


माँ की कोमल छूअन ...........................!





तुम हो सावन की ठंडी ;


बयार .................


वीणा के तारों से अलापती ,


एक मधुर झंकार .........................!





तुम पूर्ण हो ;


और में एक अधूरा ख्वाब ........


जिसकी पूर्णता तभी हे


जब इसे देखो तुम ,


एक नज़र ..............................!



तुम हो एक सार्थक प्रयास ;

तुम हो अभिलाषा .........................


उन सभी अभिलाषाओं की ,


जिनको सभी करना चाहते हे ....


पूरी


सब दिन रात........................!





तुम लगन हो ,


मेरे जीवन की ;


आस मेरे जीवन की .........


तुम अंदाज़ हो मेरा


कुछ ख़ास ,



मेरे घर का


सौभाग्य ......


गृहलक्ष्मी , अन्नपूर्णा


सुख समृद्धि की देवी .............!





मेरे लिए माता पिता का


शुभाशीष .........


तुम हो मेरे जीवन की सम्पूर्णता ,


तुम हो विश्वास ,,,,,,


मेरा आभास ..........................!





तुम हो एक कहानी ;


जो कभी नही कही गयी............


दृश्य ,


जो कभी दिखाई नहीं दिया..........!



तुम एक सच्चाई हो


मेरी ....


जिसे कोई बदल नही सकता ,


तुम मेरी किस्मत में नहीं .......


खुद मेरी किस्मत हो ....................!




तुम हो एक आदर्श ,


सबके लिए ..........


तुम हो सर्वत्र ,


सभी जगह..................!



तुम कोई कृति नही ,


खुद रचयिता हो........


जीवन का उद्देश्य देती ;


जो सबको ..................!





तुम हो अंतहीन ,


तुम हो मेरे जीवन की .....


प्रथम और
अंतिम



अभिलाषा ..........................


अनंत तक ............................................. !











विशाल 29.03.2010

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