Friday, April 23, 2010

माँ की याद

ma मुझे आज तेरी बहुत याद आई
आँखों में तस्वीर आते ही तेरी ...
दोनों आँखे छलक आई...

नींद नहीं आती माँ,
चैन एक पल को नही पता हूँ ...
जब जब तुझे में एक पल भी ...
अपने पास नही पता हूँ...

पर तू हे माँ मेरी ...
हमेशा रहती हे मेरे साथ
चाहे आज में तुझसे तन से दूर सही
पर में तो तेरे तन का ही अंश रहूँगा ॥



आज तेरी याद
मुझे ना जाने क्यों इतनी आ रही हे
आज ये दुनिया ना जाने क्यों
रंग अपना दिखला रही हे...



कभी कभी बहुत बेबस हो जाता हूँ॥
दुनिया से लड़ नहीं पाता हूँ
तब तेरा आशीर्वाद मुझे मिल जाता हे...
तेरे साथ का एह्सास उस वक्त
सच में मुझे हो जाता हे !










विशाल २३.०४.२०१०

Wednesday, April 7, 2010

असमंजस ......!!!!!!!!!!




मैं हूँ व्यथित ....

चलता अकेला ....


सरकंडों की पुलिया पर ....


लक्ष्यहीन !



में व्यथित हूँ ....


हालात से....


घूम रहा हूँ अपनी धुरी पर .....


सुर्यविहीन अन्तरिक्ष में ....



में व्यथित हूँ


नींद में बडबडाता सा ....


असामान्य सा स्वप्न देखता....


अघटित हो होते हुए देखता....


मेरे समय के पहिये की हवा निकाल दी जेसे किसी ने ....


लहराता इधर उधर ,गिरता संभलता ....



में व्यथित हूँ....


हस्त विहीन काया को लेकर ....


बहते अश्रुओं को केसे रोकूँ ?


आत्मा पर लगा कलंक केसे साफ़ करूँ ?



में व्यथित हूँ...


मन की सीमाएं बंधन में हे....


सोच पर कसकर रस्सी बाँध दी गई हे ....


कैसे कल्पना करूँ ?


नव संसार की .....!




विशाल ८.०४.2010

Tuesday, April 6, 2010

व्यथा....



दिल एक उजड़ी सराय हे अब ....

यंहा कोई रहने नही आता ....

वीरान हो चुकी हे ज़मीन इसकी ....

अब कोंई, गुल यंहा नहीं सजाता ....




दरवाज़े गल गए हे सारे ....

दीवारे गिर गयी हे इसकी ....

बेनूर खिडकियों से भीतर ....

रौशनी का कोई कतरा नहीं आता ....



मुख़्तसर हो गया हे की अब ये खंडहर हे ....

कुछ भूली हुई यादों का घर हे ....

इसकी दरारों में अब कोई ....

पैबंद लगाने नहीं आता....



कुछ टूटी हुई यादें पड़ी हे किसी कोने में ....

कुछ सपने बिखरे हे इधर उधर ....

इन टूटे शीशे के टुकडो में ......

कोई सूरत देखने नहीं आता....



दिल एक उजड़ी सराय हे ...

अब कोई ख्वाब सजाने नहीं आता....!



विशाल 06.04.2010






Saturday, April 3, 2010

तुम को समर्पित ........



कुछ नए रंग खिले जीवन में

एक नई प्रेरणा का संचार हुआ

सुलझने लगी अनसुलझी बाते

जबसे तुमसे प्यार हुआ



असीम आनंद और उन्माद हे मन में

साँसों को नवीन प्रवाह मिला

हर्षित हे मन, हर्षित हे तन

जब से तुमसे प्यार हुआ



समागम हो रहा नई आत्मा का

प्रकाशमान ये संसार हुआ

कंही छुपा था अँधियारा जो मन में

अस्तित्व उसका तार-तार हुआ



ये रंग खिले जीवन में तबसे ,

जबसे तुमसे प्यार हुआ



पता नहीं कब से तुमसे प्यार हुआ ?


विशाल ३.०४.२०१०

Friday, April 2, 2010

"एक ख़त ...."




वो जो लिखते हे लहू से ख़त हमको


दिल का दर्द उनकी कलम से निकल पड़ता है


कलम का नही , कागज़ का नही ,


खुद लिखावट का सीना फट पड़ता हेj




ये आवाज जो उनके दिल से निकली हे


रूह ही नही ,धड़कने भी साथ पिघली हे


वो लम्हा ,वो तारीख ही नहीं


हर जर्रे की आह ,कलम से निकली हे




ये ख़त जज्बात हे उनके दिल का


तमन्ना हर धड़कन की, एहसास हर ख्वाब का


ये कागज़ पर बिखरा लाल रंग ॥


लिए कुछ खास अंदाज़ उसका




जिंदगी सारी निकल का रख दी


इबारत में उन्होंने यूँ अचानक


har आंसू हमारी आँखों का


रोने लगा यूँ अचानक




मुझे एहसास हे


कितना प्यार हमें किया करते हे


लहू निकालते हे जिगर का


और ख़त हमें लिखा करते हे !




vishal २.०४.2010


Thursday, April 1, 2010

इन्तजार में




नयन द्वार में बंदनवार


कबसे बांधे बैठा हूँ


स्वागत में तुम्हारे प्रिये


इन्तजार में बैठा हूँ !!




हृदय में नव संसार की छाया


हार-श्रृंगार सजाकर


अधरों पर हलकी मुस्कान लिए


बाहे पसारे बैठा हूँ !!




कोमल पुष्प सुशोभित केशो में


सुकोमलिनी तुम लगती लगती हो


पदचाप तुम्हारी सुनाई देती जँहा


उस राह में पुष्प सजाये बैठा हूँ !!




मधुमास में मधु बरसाती


कोयल कंठ सी गीत सुनाती


प्रतिबिम्ब तुम्हारा पाने को


दर्पण लगाए बैठा हूँ !!




स्वागत में तुम्हारे प्रिये .....


सदियों से इंतज़ार में बैठा हूँ !!








विशाल १.०४.१०