Friday, April 2, 2010

"एक ख़त ...."




वो जो लिखते हे लहू से ख़त हमको


दिल का दर्द उनकी कलम से निकल पड़ता है


कलम का नही , कागज़ का नही ,


खुद लिखावट का सीना फट पड़ता हेj




ये आवाज जो उनके दिल से निकली हे


रूह ही नही ,धड़कने भी साथ पिघली हे


वो लम्हा ,वो तारीख ही नहीं


हर जर्रे की आह ,कलम से निकली हे




ये ख़त जज्बात हे उनके दिल का


तमन्ना हर धड़कन की, एहसास हर ख्वाब का


ये कागज़ पर बिखरा लाल रंग ॥


लिए कुछ खास अंदाज़ उसका




जिंदगी सारी निकल का रख दी


इबारत में उन्होंने यूँ अचानक


har आंसू हमारी आँखों का


रोने लगा यूँ अचानक




मुझे एहसास हे


कितना प्यार हमें किया करते हे


लहू निकालते हे जिगर का


और ख़त हमें लिखा करते हे !




vishal २.०४.2010


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