Tuesday, April 6, 2010

व्यथा....



दिल एक उजड़ी सराय हे अब ....

यंहा कोई रहने नही आता ....

वीरान हो चुकी हे ज़मीन इसकी ....

अब कोंई, गुल यंहा नहीं सजाता ....




दरवाज़े गल गए हे सारे ....

दीवारे गिर गयी हे इसकी ....

बेनूर खिडकियों से भीतर ....

रौशनी का कोई कतरा नहीं आता ....



मुख़्तसर हो गया हे की अब ये खंडहर हे ....

कुछ भूली हुई यादों का घर हे ....

इसकी दरारों में अब कोई ....

पैबंद लगाने नहीं आता....



कुछ टूटी हुई यादें पड़ी हे किसी कोने में ....

कुछ सपने बिखरे हे इधर उधर ....

इन टूटे शीशे के टुकडो में ......

कोई सूरत देखने नहीं आता....



दिल एक उजड़ी सराय हे ...

अब कोई ख्वाब सजाने नहीं आता....!



विशाल 06.04.2010






1 comment:

  1. awesome poem dear...keep it up...dil ko choo gai...

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