Thursday, July 1, 2010

तुम जानती हो... ना !



मै जब भी दर्पण देखता हूँ
सोचता हु, रुकता हूँ, फिर सोचता हूँ
की ये कौन हे,

क्या ये में हूँ,
में ऐसा क्यों हूँ,
में ऐसा नही हूँ,,
फिर में क्यों ऐसा नजर आ रहा हूँ,

चेहरे पर शिकन,
आँखों मै थकन ॥
आँखों के नीचे काले घेरे ,,
ये मै नहीं हूँ,

मै तो खिलखिलाता था
मुस्कुराता था,
आँखों में चमक दिखाई देती थी कभी मेरी,,
में ऐसा क्यों हो गया हूँ,,

अधर सूख से गए हे ,
हंसी कंही गम सी हो गयी हें
मेरे चेहरे पर पर खुशियाँ दिखाई देती थी सबको,,
पर ये में नहीं हूँ,,

क्यों कोई उम्मीद नज़र नही आ रही है
क्यों कोई ख़ुशी नज़र नहीं आती ,,
क्यों मेरी आँखे बेजान हो गई हें,,
क्यों इनमे चमक नही हें ,,,

तुम जानती हो ना !
विशाल 01.07.2010

No comments:

Post a Comment