हुआ कुछ ऐसा की हम मिले....
मिलते ही तुमसे कुछ एसा अनुभव हुआ ...
जेसे, शरीर में ...
सेकड़ो बिजलियाँ कौंध गयी फिर ...
धीरे से कानो में आकार तुमने कुछ कहा..
ऐसा लगा .... हजारों घुंघरुओं की छमछम हुई...
तन मन में...
या सावन की फुहार की गुनगुन हुई ...
तुमसे मिलना कोई स्वप्न सा लगता हें...
कई सदियों से देखा एक स्वप्न ....
आज पूर्ण हुआ जो....
विधाता का केसा खेल हें ये ...
मेरे किसी पिछले जन्म के पाप का फल ...
लगता हें ये.... की तुमसे मिलकर भी मिल नही पाउँगा...
पर में खुश हूँ ....
इतरा रहा हूँ .....
जितना भी साथ हें मेरा तुम्हारा...
में खुश हूँ ...बहुत खुश हूँ...
विशाल
14 april,2011
bhut khubsurat...
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