Friday, September 16, 2011

लगन ........



अक्सर मेने देखा हें ..
तुमको...

अकेले में किसी उधेड़ बुन में ...

अँगुलियों से गीली रेत पर ....
लकीरें खींचते ......

पानी पर किसी का नाम लिखते .....


कल्पनाओ में रेखाचित्र उकेरते ......
कुछ अजीब से

जिन्हें सोचकर तुम ....
कभी मुस्कुराती हो ...
कभी थोडा शरमाती हो

अक्सर मेने तुमको देखा हें ...
दांतों में अंगुलियाँ दबाते...
हाथो को बांध कमर के पीछे
इठलाते ...

की में जानता हूँ ...
ये निशानियाँ क्यों है
क्या कारण है ?

की

तुम्हारी कल्पनाओं पर ....
नवीन परों का उद्भव है...
परवाज़ तुम्हारी ..
ऊंची दिखाई देती हें अब


किसी से मिलन को आतुर ...
तुम्हारे दो नयन लगते है....

इंतज़ार का घूंघट ओढ़े ...
अक्सर तुमको देखा हें ...
मेने

में जान पाया हूँ अब...
की तुमको किसी की लगन लग गयी हें
तुम्हे प्रेम हो गया है.....




विशाल ....16/08/2011

Thursday, September 15, 2011

अविश्वास .........


लिखना चाहता हूँ कुछ
संवेदनशील पर संवेदनाओं से परे...
अतीत के झरोखे से झांकती ....
तुम्हारे अविश्वास की परछाई ....

कुछ दबे हुए से शब्द ....
जो
गूंजना चाहते हें ...
चीत्कार बनाकर ...

यादों के खँडहर में गिद्ध बनाकर जो
नोचना चाहते हें ...
झूठे प्रेम की लाश को

छिन्न भिन्न हुआ आज ....
अविश्वास की नीव पर टिका ...
तुम्हारी आँखों से दीखता मेरा अस्तित्व ...

युगों से नैनों में था मेरे जो ...
दिवा स्वप्न वो समाप्त हुआ...
संक्षिप्त लगता था जो
सागर सा उस जीवन का विस्तृत आभास हुआ...

एक क्षण को आती हें तुम्हारी
मधुर यादें ...
विचलित करने....


पर में अब संभाल गया हूँ
नहीं उलझता उन स्मृतियों की भूल भुलैय्या में...
किंचित भी संदेह नही खुद पर ...

की में एक अपराधी हूँ....
बस आज स्वतन्त्र हूँ ....
पूर्ण रूप से संतुष्ट हूँ... !!






विशाल १६.०८.२०११

Wednesday, September 7, 2011

YOurs Me ...Only








मुझ पर क्यों इतना बिगड़ते हो तुम ...

की मै देख नहीं पाता .....

तुमको हताश होते ....

आँखों में सवाल लिए...

तुम्हारे माथे पर सिलवटें देखकर ...
क्या बात हें मुझमे ऐसी ....
क्यों हैरान हो मेरी हर बात पर॥


नाराजगी का कैसा दौर हें ये...
जिसने खींच दी हें...

एक लक्ष्मण रेखा ....
मेरे तुम्हारे बीच में.....



काश मै खुद अपना आईना होता .....

तो देख पाता खुली आँखों से .....

अपनी गलतियां ...
तुम्हारी परेशानियों का सबब....


रह गया किसी बंद कमरे के कोने में पड़ा ......
हमारा वो अटूट बंधन ....

तडपता ,सिसकता ....

की


काश तुम समझ पाते कभी...
जान पाते जो मेरे दिल में है....

की में क्या सोचता हूँ.....

क्या चाहता हूँ.....

tum
सदा से मेरे ह्रदय में हो...
janta हूँ थोडा अलग सा हु में ...
सबसे

पर तुम्हारा हूँ....
जैसा भी हूँ...
हमेशा से ...

मत रहो अब परेशांन यूँ॥
की..


में देख नहीं पाता तुमको
इस हाल में....





विशाल 08.09.2011