
अक्सर मेने देखा हें ..
तुमको...
अकेले में किसी उधेड़ बुन में ...
अँगुलियों से गीली रेत पर ....
लकीरें खींचते ......
पानी पर किसी का नाम लिखते .....
कल्पनाओ में रेखाचित्र उकेरते ......
कुछ अजीब से ।
जिन्हें सोचकर तुम ....
कभी मुस्कुराती हो ...
कभी थोडा शरमाती हो ॥
अक्सर मेने तुमको देखा हें ...
दांतों में अंगुलियाँ दबाते...
हाथो को बांध कमर के पीछे॥
इठलाते ...
की में जानता हूँ ...
ये निशानियाँ क्यों है ॥
क्या कारण है ?
की
तुम्हारी कल्पनाओं पर ....
नवीन परों का उद्भव है...
परवाज़ तुम्हारी ..॥
ऊंची दिखाई देती हें अब ॥
किसी से मिलन को आतुर ...
तुम्हारे दो नयन लगते है....
इंतज़ार का घूंघट ओढ़े ...
अक्सर तुमको देखा हें ...
मेने ॥
में जान पाया हूँ अब...
की तुमको किसी की लगन लग गयी हें
तुम्हे प्रेम हो गया है.....
विशाल ....16/08/2011

