Thursday, September 15, 2011

अविश्वास .........


लिखना चाहता हूँ कुछ
संवेदनशील पर संवेदनाओं से परे...
अतीत के झरोखे से झांकती ....
तुम्हारे अविश्वास की परछाई ....

कुछ दबे हुए से शब्द ....
जो
गूंजना चाहते हें ...
चीत्कार बनाकर ...

यादों के खँडहर में गिद्ध बनाकर जो
नोचना चाहते हें ...
झूठे प्रेम की लाश को

छिन्न भिन्न हुआ आज ....
अविश्वास की नीव पर टिका ...
तुम्हारी आँखों से दीखता मेरा अस्तित्व ...

युगों से नैनों में था मेरे जो ...
दिवा स्वप्न वो समाप्त हुआ...
संक्षिप्त लगता था जो
सागर सा उस जीवन का विस्तृत आभास हुआ...

एक क्षण को आती हें तुम्हारी
मधुर यादें ...
विचलित करने....


पर में अब संभाल गया हूँ
नहीं उलझता उन स्मृतियों की भूल भुलैय्या में...
किंचित भी संदेह नही खुद पर ...

की में एक अपराधी हूँ....
बस आज स्वतन्त्र हूँ ....
पूर्ण रूप से संतुष्ट हूँ... !!






विशाल १६.०८.२०११

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