
मुझ पर क्यों इतना बिगड़ते हो तुम ...
की मै देख नहीं पाता .....
तुमको हताश होते ....
आँखों में सवाल लिए...
तुम्हारे माथे पर सिलवटें देखकर ...
क्या बात हें मुझमे ऐसी ....
क्यों हैरान हो मेरी हर बात पर॥
नाराजगी का कैसा दौर हें ये...
जिसने खींच दी हें...
एक लक्ष्मण रेखा ....
मेरे तुम्हारे बीच में.....
काश मै खुद अपना आईना होता .....
तो देख पाता खुली आँखों से .....
अपनी गलतियां ...
तुम्हारी परेशानियों का सबब....
रह गया किसी बंद कमरे के कोने में पड़ा ......
हमारा वो अटूट बंधन ....
तडपता ,सिसकता ....
की ॥
काश तुम समझ पाते कभी...
जान पाते जो मेरे दिल में है....
की में क्या सोचता हूँ.....
क्या चाहता हूँ.....
tum सदा से मेरे ह्रदय में हो...
janta हूँ थोडा अलग सा हु में ...
सबसे ॥
पर तुम्हारा हूँ....
जैसा भी हूँ...
हमेशा से ...
मत रहो अब परेशांन यूँ॥
की..
में देख नहीं पाता तुमको
इस हाल में....
विशाल 08.09.2011
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